Hindi हिंदी क्षितिज-2

प्रश्न 15-5: परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ाते हों - तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर 15-5: परम्पराएँ मानव-जीवन को सुन्दर व सुखमय बनाने के लिए होती हैं। प्रकृति ने मानव को स्त्री और पुरूष दो वर्गों में विभाजित किया है। सृष्टि में दोनों की समान भागीदारी है। प्रकृति की ओर से कोई भेदभाव नहीं किया गया है। स्त्री हर क्षेत्र में पुरूषों की बराबरी कर रही है। स्त्री-पुरूष परस्पर मिलकर परिवार और समाज को बेहतर बना सकते हैं। इस कारण दोनों का प्रत्येक क्षेत्र में समान योगदान होता है। जहाँ तक परम्परा प्रश्न है, परम्पराओं का स्वरुप पहले से बदल गया है। अतः परम्परा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री-पुरूष की समानता को बढ़ाते हैं।


प्रश्न 15-6: तब की शिक्षा प्रणाली और अब की शिक्षा प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।

उत्तर 15-6: पहले की शिक्षा प्रणाली और आज की शिक्षा प्रणाली में बहुत परिवर्तन आया है। तब की शिक्षा प्रणाली में स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था पहले शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों को गुरुकुल में रहना ज़रूरी था। परन्तु आज शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालय है। पहले शिक्षा एक वर्ग तक सीमित थी। लेकिन आज किसी भी जाति के तथा वर्ग के लोग शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। आज की शिक्षा प्रणाली में स्त्री-पुरूषों की शिक्षा में अंतर नहीं किया जाता है। पहले की शिक्षा में जहाँ जीवन-मूल्यों की शिक्षा पर बल दिया जाता था वहीँ आज व्यवसायिक तथा व्यावहारिक शिक्षा पर बल दिया जाता है। गुरु-परम्परा भी लगभग समाप्त सी हो चली है।


प्रश्न 15-7: महावीर प्रसाद द्विवेदी का निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है, कैसे?

उत्तर 15-7: हावीरप्रसाद द्विवेदी जी ने अपने निबंध "स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन" में स्त्रियों की शिक्षा के प्रति अपने विचार प्रकट किये हैं। उस समय समाज में स्त्री शिक्षा पर प्रतिबंध था। इस निबंध में द्विवेदी जी ने स्त्रियों के भी पढ़ने-लिखने का ज़ोरदार समर्थन किया है। स्त्री-शिक्षा के विरोधियों के सभी कुतर्कों का उन्होंने बहुत ही कड़े शब्दों में खंडन किया हैं। उन्होंने पुराने ज़माने में स्त्री-शिक्षा पर प्रतिबन्ध होने की मिथ्या धारणा का सप्रमाण गलत सिद्ध किया है। स्त्री-शिक्षा को अनर्थकारी बताने के कुतर्क को भी उन्होंने अनुचित एवं गलत प्रमाणित किया है। साथ ही यह भी विचार प्रकट किया है कि स्त्री-शिक्षा के उपरान्त ही समाज की उन्नति संभव है। स्त्री को भी पुरूष के ही समान अधिकार दिये जाने की बात को तर्कपूर्ण ढंग से सिद्ध करते हुए द्विवेदी जी ने इस निबंध में अपनी उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचय दिया है।